ज़रूरत है संभलने की
ज़रूरत है थामने की,
ज़रूरत है बचाने की
ज़रूरत है बदलने की,
ज़रूरत है अब तो यारो
कुछ कदम बढ़ाने की.
कब तक सहेजी ये धरती
मनमानी और नाफरमानी आपकी,
कब तक चलेगी यूँ ही
ये आधुनिकरण की धुरी,
ज़रूरत है संभलने की
कुछ कर गुजरने की.
और कितना करोगे दोहन
कितना करोगे शोषण तुम,
अब तो ठहर जाओ सज्जनो
अब तो बस भी कर दो तुम,
ज़रूरत है समागम की
हाथ से हाथ मिलाने की.
हमारी ही है ये धरती
हमारा ही क्षितिज नभ है,
हमे ही तो मिलकर के
इससे आतप से बचाना है,
ज़रूरत है ज़माने की ओर
माँ क दामन को बचाने की.
ज़रूरत है इरादो कोज़मीनी हकीकत दिखने की,
ज़रूरत है "पंचतत्व" को ही
ये अलख जगाने की
ओर धरा जीवन में नई
हरियाली - खुशहाली लाने की.
